NGT ने MP के 8 शहरों को ‘नॉन-अटेनमेंट’ घोषित किया, भोपाल की हवा पर सख्त टिप्पणी
पिछले 5 वर्षों से NAAQS से अधिक प्रदूषण, राज्य स्तरीय प्रदूषण नियंत्रण योजना तलब

Bhopal: मध्य प्रदेश में बिगड़ती वायु गुणवत्ता पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 7 January 2026 को कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल ज़ोन बेंच, भोपाल ने राज्य के 8 प्रमुख शहरों, जिनमें भोपाल, इंदौर और उज्जैन शामिल हैं, को ‘नॉन-अटेनमेंट सिटी’ घोषित करते हुए कहा है कि ये शहर वर्षों से निर्धारित वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे हैं।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान राशिद नूर खान द्वारा दायर याचिका पर विचार करते हुए ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वच्छ हवा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को निर्धारित की गई है।
भोपाल में खतरनाक स्तर पर प्रदूषण
एनजीटी के अवलोकन के अनुसार, भोपाल में वार्षिक औसत PM10 का स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच दर्ज किया गया है, जबकि इसकी अनुमेय सीमा 60 है। वहीं PM2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच पाया गया, जबकि मानक सीमा 40 है।
रियल-टाइम आंकड़ों के अनुसार, शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स दिन के समय अक्सर ‘वेरी पुअर’ श्रेणी में रहता है और रात के समय, विशेषकर सर्दियों में, ‘सीवियर’ स्तर को पार कर जाता है।

पांच वर्षों से NAAQS का उल्लंघन
एनजीटी ने 7 जनवरी 2026 के अपने आदेश में उल्लेख किया कि भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत आधिकारिक रूप से ‘नॉन-अटेनमेंट सिटी’ घोषित किया गया है। इन शहरों में लगातार पांच वर्षों से अधिक समय से PM10 और PM2.5 के स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर बने हुए हैं।
झीलों का शहर अब धुएं में घिरा
ट्रिब्यूनल ने टिप्पणी की कि कभी ‘झीलों का शहर’ कहलाने वाला भोपाल अब केवल कभी-कभार नहीं, बल्कि लगातार वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। प्रदूषण के प्रमुख कारणों में बढ़ता वाहन उत्सर्जन, रायसेन, सीहोर और विदिशा जैसे आसपास के जिलों में पराली जलाना, निर्माण और विध्वंस से उड़ने वाली धूल, पटाखों का उपयोग, खुले में कचरा जलाना और भानपुर लैंडफिल से होने वाला उत्सर्जन शामिल है।
दिल्ली जैसा GRAP प्लान नहीं, MP पिछड़ा
एनजीटी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, गंभीर AQI की स्थिति में निर्माण गतिविधियों पर रोक, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों और पटाखों पर नियंत्रण जैसे उपायों का स्थानीय स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। ट्रिब्यूनल ने तुलना करते हुए कहा कि जहां दिल्ली-एनसीआर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू है, वहीं मध्य प्रदेश में ऐसा कोई राज्य स्तरीय तंत्र मौजूद नहीं है।
संयुक्त समिति गठित, 6 सप्ताह में रिपोर्ट
मामले को गंभीर पर्यावरणीय चिंता बताते हुए एनजीटी ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। साथ ही पर्यावरण विभाग, नगरीय विकास, परिवहन विभाग, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा सीपीसीबी के एक पूर्व अधिकारी को शामिल करते हुए एक संयुक्त समिति का गठन किया गया है। समिति को छह सप्ताह के भीतर कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।




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