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Bloomberg रीबैलेंसिंग से कमोडिटी बाजार में हलचल, चांदी पर दबाव तो सोना मजबूत

जहां चांदी पर दबाव है, वहीं सोना अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है। रीबैलेंसिंग के बाद प्रेशियस मेटल्स का कुल वेटेज बढ़कर 18.84% हो गया है। इसमें गोल्ड का वेटेज 14.29% से बढ़कर 14.90% हो गया है, जिससे सोना Bloomberg Commodity Index का सबसे बड़ा कंपोनेंट बन गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रीबैलेंसिंग के चलते सोने में भी सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव संभव है।

Mumbai: वैश्विक कमोडिटी बाजारों में जनवरी के दूसरे सप्ताह में तेज़ उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसकी बड़ी वजह Bloomberg Commodity Index (BCOM) की सालाना रीबैलेंसिंग प्रक्रिया है, जो 8–9 जनवरी से शुरू होकर 15 जनवरी तक चलेगी। इस दौरान खासतौर पर सोना और चांदी में तेज़ हलचल की संभावना जताई जा रही है।

BCOM को ट्रैक करने वाले पैसिव फंड्स के पास लगभग 108.8 अरब डॉलर की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) है। इंडेक्स में वेटेज बदलते ही इन फंड्स को अपने पोर्टफोलियो में बड़े स्तर पर खरीद-बिक्री करनी पड़ती है, जिससे फ्यूचर्स मार्केट पर दबाव बनता है और कीमतों में अस्थिरता बढ़ जाती है।

 

चांदी पर क्यों बढ़ा दबाव

रीबैलेंसिंग के दौरान चांदी के वेटेज में तेज़ कटौती की जा रही है। अनुमान है कि इसका असर भारी बिकवाली के रूप में सामने आ सकता है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, चांदी पर दबाव सिर्फ इंडेक्स रीबैलेंसिंग तक सीमित नहीं है। ऊंची कीमतों के कारण फिजिकल डिमांड में नरमी, डॉलर इंडेक्स में रिकवरी, शॉर्ट टर्म करेक्शन की आशंका और बाजार में फिजिकल सप्लाई बढ़ने के संकेत भी इसकी कीमतों को कमजोर कर रहे हैं। इन सभी कारणों से जनवरी के मध्य तक चांदी में कमजोरी बनी रह सकती है।

 

सोना बना BCOM का सबसे बड़ा कंपोनेंट

जहां चांदी पर दबाव है, वहीं सोना अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है। रीबैलेंसिंग के बाद प्रेशियस मेटल्स का कुल वेटेज बढ़कर 18.84% हो गया है। इसमें गोल्ड का वेटेज 14.29% से बढ़कर 14.90% हो गया है, जिससे सोना Bloomberg Commodity Index का सबसे बड़ा कंपोनेंट बन गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रीबैलेंसिंग के चलते सोने में भी सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव संभव है।

 

रीबैलेंसिंग के नियम

BCOM की रीबैलेंसिंग तय नियमों के तहत होती है। किसी भी कमोडिटी ग्रुप का वेटेज 33% से अधिक नहीं हो सकता, जबकि किसी एक कमोडिटी और उसके डेरिवेटिव का वेटेज 25% से ज्यादा तय नहीं है। इसके अलावा किसी भी सिंगल कमोडिटी का वेटेज 15% से अधिक और 2% से कम नहीं हो सकता। इन्हीं नियमों के कारण जिन कमोडिटीज़ में हाल के महीनों में तेज़ी ज्यादा रही है, उनके वेटेज में कटौती की जाती है।

 

कुछ कमोडिटीज़ को मिल सकता है फायदा

रीबैलेंसिंग के दौरान तांबे (कॉपर) के वेटेज में बढ़ोतरी की गई है। कोको को लंबे समय बाद इंडेक्स में शामिल किया गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड में इनफ्लो की संभावना जताई जा रही है। दूसरी ओर WTI क्रूड और नेचुरल गैस पर दबाव बना रह सकता है।

 

कम लिक्विडिटी, ज्यादा वोलैटिलिटी

रीबैलेंसिंग ऐसे समय हो रही है जब जापान और चीन में छुट्टियों के कारण बाजार बंद रह सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर लिक्विडिटी घटेगी और कीमतों में तेज़ मूवमेंट देखने को मिल सकता है।

 

निवेशकों के लिए संकेत

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कमजोरी फंडामेंटल नहीं बल्कि टेक्निकल और मैकेनिकल कारणों से है। रीबैलेंसिंग पूरी होने के बाद बाजार में स्थिरता लौट सकती है और निवेशकों के लिए रिकवरी के अवसर बन सकते हैं।

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